मीडिया का सबसे ज्यादा बेड़ागर्क करने वाला एंकर हैं अर्णव |

किसान आंदोलन रिपोर्टिं में सुधीर और अमिश को बड़े मार्जन से किया पीछे |

ग़रीब और मजदूर वर्ग अच्छी तरह समझ गया हैं कि धरतीपुत्र देशद्रोही नहीं |

संजय साग़र। पूंजीपतियों के टुकड़े टुकड़े के मोहताज फेंके टुकड़ों पर पलने के आदी न्यूज़ एंकरों को यह लगता है कि बॉर्डर पर जमे लोग किसान नहीं हैं। वहीं, किसानों का कहना हैं कि एक छोटा सा रियल्टी टेस्ट है उनके लिये अर्नब गोस्वामी, सुधीर चौधरी,अमीश देवगन,दीपक चौरसिया इत्यादि खुद बॉर्डर पर आयें और अपनी पसंद के सॉफिस्टिकेटेड से चार बंदे चुनें और दोनों जन हाथ में फावड़े लेकर खुदाई शुरू करें। सिर्फ पांच मिनट में तय हो जायेगा कि कौन किसान,नॉन किसान है और कौन पत्रकार प्रेस्टीच्यूट ? बंद स्टूडियो में कोट – टाई पहनकर कुछ भी बकैती करने वाले यह बड़े बड़े नामी पत्रकार नामधारी खबर विक्रेता यह भूल जाते हैं कि उनके ही चैनल में एक बहुत बड़ी टीम फील्ड रिपोर्टर्स की भी होती है। यह जो भी झूठी बकवास स्टूडियो में बैठकर करते हैं उसका खामियाजा और तिरस्कार इन फील्ड रिपोर्टर्स को झेलना पड़ता हैं। मोटी तनख्वाहों वाले खबर दानवों एक बार इन बेचारे फील्ड रिपोर्टर्स को भी देख लिया करो। जो तुम्हारी 10% तनख्वाह में जान जोखिम में डालते हैं। इनमें से ज्यादातर तुम्हें धरातलीय सच्चाई बताना और दिखाना चाहते हैं लेकिन तुम्हारी लिप्साओं के आगे बेचारे चुप हो जाते हैं। अब वो बेचारे आज की मंदी के दौर में नौकरी छोड़ भी नहीं सकते,लेकिन तुम तो कुछ शर्म करो। इस किसान आंदोलन की सबसे खास बात ही यह है कि किसानों ने इन कानूनों का बिटवीन द लाइंस पढ़ लिया।यानि जो नहीं लिखा था वह पढ़ लिया। सरकार को किसानों से यह उम्मीद नहीं थी कि वो इन कानूनों का बिटवीन द लाइंस पढ़ लेंगे और आंदोलन पर आ जायेंगे। संविधान,आईपीसी लिखे ज़माना हो गया पर फिर भी कामयाब वकील वही कहलाता है जो इन लिखी हुई किताबों में से वो चीजें निकालकर कोर्ट को पढ़ा दे जो नहीं लिखी गयी हैं। किसान बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि अगर 2 साल बाद के झुनझुने को थामे वो अगर आज उठ गये तो जीवन भर फिर आंदोलन के काबिल ही नहीं बचेंगे। यह बात सरकार भी जानती है सो 2 साल का दाँव फेंक दिया। पूंजीपतियों द्वारा खरीदी गई बिकाऊ मीडिया ने पहले खालिस्तान फिर पाकिस्तान,चीन फिर सिक्ख,गैर सिक्ख,अब अमीर किसान,गरीब किसान यानि सरकार या उसका अमला हर प्रयास कर रहा है कि इनको वर्गों में बाँट कर आंदोलन खत्म करा दो किसान इन 3 कानूनों में जो नहीं लिखा गया है वो पढ़ सकने की सलाहियत रखते हैं।क्या किसानों के वर्गीकरण और 2 साल के झुनझुने से बहल जायेंगे और आंदोलन खत्म कर देंगे ? आंदोलन से जुड़े अधिकांश किसानों का एक दर्द ऐसा भी है,जिसे वो खुलकर कह भी नहीं पा रहे।किसानों ने भी उसी उत्साह से कमल पर बटन दबाया था, आज कहाँ सो रहे हैं? सड़क पर कल को किसकी बारी आयेगी?आज जो किसान आन्दोलन कर रहे हैं उनमें से अधिकांश ने 2014 और 2019 में बड़ी जोर शोर से भाजपा को कम मोदी के नाम पर वोट ज्यादा किया था। पेट की और भविष्य की लाचारी में किसान कड़ाके की ठंड,ओले और ऊपर से बारिश के बावजूद डटे हैं। किसान आंदोलन 41वें दिन में पहुंच गया है और सर्दी रिकॉर्ड स्तर पर। पिछले 15 साल में सबसे ज़्यादा ठंडा था। उसके बारिश ने किसानों के लिए और मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।बारिश के बाद हवा में नमी होने की वजह से दिल्ली का प्रदूषण स्तर भी बेहद गंभीर हो गया है। बारिश की वजह से धरनास्थलों पर अव्यवस्था का माहौल हो गया। सिंघु बॉर्डर पर स्टेज के पास लगाए गए किसानों के गद्दे भी भीग गए और कार्यक्रम चलाने में दिक्क़तें आईं। जहां खाना बनता है वहां भी कुछ तंबुओं से पानी रिसने लगा और कीचड़ की वजह से लोगों को खाना खिलाने में भी समस्या हुई। सिंघु बॉर्डर पर लंगर सेवा में खाना बनाना भी मु्श्किल हो गया क्योंकि बाहर रखी लकड़ियाँ गीली हो गईं। हमने किसी तरह बची हुई सूखी लकड़ियों और गैस सिलिंडर से काम चलाया। लेकिन असली समस्या शुरू हुई जब हम खाना बाँटने लगे। जिन चटाइयों पर लोग बैठ कर खाते हैं, वे पूरी गीली हो गई। कीचड़ भरी सड़कों पर लोगों को खड़े-खड़े भोजन करना पड़ा। खैर, धरतीपुत्र का परेशानिया तो गहना हैं।सरदारों के चुटकुले और जाटों के कटाक्ष दोनों लाजबाब ही होते हैं। लेकिन राकेश टिकैत ने जो बात कटाक्ष में कही वो ही पूरे किसान आंदोलन का सार है। पत्रकार अजीत अंजुम पूछते हैं कि आपने दोनों तरफ की रोड बंद कर दी इससे लोग बहुत तकलीफ होने की शिकायत कर रहे हैं। टिकैत कहते हैं “हम बात करेंगे”। अंजुम फिर पूछते हैं कि “अरे किससे बात करेंगे, शिकायत तो लोग कर रहे हैं”। टिकैत फिर वैसे ही जबाब देते हैं “उन्हीं से ही बात करेंगे, जो मक्का हम 8 रुपये में देते हैं वो उसे यहाँ 140 रुपये में खरीदते हैं। उन्हीं को बतायेंगे कि “उन्हीं के लिये यहाँ बैठे हैं”। मेरी जेब में पैसे हों ना हों मोबाइल में डाटा बहुत है। उसी डाटा का इस्तेमाल कई दिनों से यही समझाने में कर रहा हूँ कि बचेगा कोई नहीं।अगर आज खड़े नहीं हुये तो जब मेरी और आपकी बारी आयेगी तो अपना रोना रोने के लिये इस डाटा का इस्तेमाल फेसबुक और वाट्सअप पर भी नहीं कर पायेंगे क्योंकि वो भी पूजीपतियों का हो चुका होगा और साथ तो कोई देगा ही क्यों, आपने दिया था क्या ? जिस सरकार और गोदी मीडिया के भरोसे आप आज बैठकर इस कानून के समर्थन में ज्ञान बाँट रहें हैं।ग़रीब और मजदूर वर्ग अच्छी तरह समझ गया हैं कि किसान किन्हीं देशद्रोहियों का नहीं, धरतीपुत्रों का आंदोलन है।क्योंकि वो जानते हैं कि जिस लड़ाई के लिये लाखों किसान आधी रात को सड़क पर खड़े हैं, अगर वो यह लड़ाई हार गये तो 2 साल बाद वो खुद सड़क पर आ जायेंगे। यह शाहीनबाग नहीं है। यहाँ के आंदोलनकारी मोदी-शाह को गाली नहीं देते बल्कि सम्मान देते हैं। उन्हें राम राम कहने में गुरेज तो दूर यह उनका रूटीन जीवन है। बिकाऊ मीडिया इस आंदोलन में देशविरोध ढूंढ रहे हैं। इतने बड़े जनांदोलन को बिकाऊ मीडिया रोज रोज नईनई नोटंकियाँ कर टीवी पर मछलिबाज़ार खोलकर आंदोलन को किसी भी तरह पूर्व आंदोलनों की भांति बिफल बनाने के प्रयास में अपना पूरा दम लगाए हुये हैं। लगता हैं दाल न गल पाने की बजह से पूरी तरह से पगला गये हैं। इस समय पूजीपतियों के टुकड़े टुकड़े के मोहताज बिकाऊ न्यूज़ एंकर फेंके टुकड़ों पर पलने के आदी हो चुके हैं। ये किसानों की
आत्महत्या वाली खबरें टीवी पर नहीं चलायेंगे? लेकिन जब लोक का ही विश्वास सरकार से खो जाये तो फिर किसी पूजीपतियों की निरंकुशता और गलत नीतियों पर रोना कैसा? चल रहे किसान आंदोलन में पूजीपतियों के टुकड़े के मोहताज न्यूज़ एंकर अपनी खुराक ढूंढने में लगे पड़े हैं। किसानों की लड़ाई सरकार से है,उसके बनाये कानून से है। हमारी लड़ाई किसी नरेंद्र मोदी से नहीं है और ना ही किसी अमित शाह से। यह आंदोलन सरकार के मुखिया के रूप में प्रधानमंत्री के विरुद्ध हो सकता है। किसी व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं है। लेकिन गोदी मीडिया अपने उसी रंग में रंगे हुये किसानों पर निजी हमले बोल रही हैं। तुर्रा यह कि वो किसान आंदोलनकारियों के साथ हैं। गोदी मीडिया का दर्द बहुत दिनों से समझ आ रहा है। इतना दर्द मत दिखाओ कि तुम ही इस आंदोलन के लिये नासूर बन जाओ। यह आंदोलन किसानों के सामने ज़िंदगी की लड़ाई है। 1 मिनट भर के लिये वाटर कैनन झेल कर देखो। तुम्हारे कपड़े किसी और चीज़ से गीले हो जायेंगे। तुम लोगों की बकबास और निजी हमले से यह लड़ाई किसान बनाम पूँजीपति बन गयी है। जो कि इस आंदोलन के लिये सबसे घातक है। आज किसान इसका शिकार हो रहे हैं,बचेगा कोई नहीं। क्योंकि देश के असली दुश्मन यही हैं जो इस बार बिकाऊ मीडिया की आड़ में अपना एजेंडा सेट कर रहे हैं।

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